(डाउनलोड) एनसीईआरटी हिंदी ( कक्षा 1-5) के संशोधित पाठ्यक्रम

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(डाउनलोड) एनसीईआरटी हिंदी ( कक्षा 1-5) के संशोधित पाठ्यक्रम 
 

भाषा एक औजार है जिसका इस्तेमाल हम जिंदगी को समझने के लिए, उससे जुड़ने के लिए और जीवन-जगत को प्रस्तुत करने के लिए करते हैं। यह सब करने के लिए जाँच-पड़ताल, तर्क, संप्रेषण जैसे कौशलों की जरूरत होती है। इसके साथ-साथ भाषा यानी बहुभाषिकता हमारी पहचान भी है और हमारी सभ्यता व संस्कृति का अभिन्न अंग भी। इसलिए यह आवश्यक है कि हिंदी सीखने-सिखाने का दायरा इतना व्यापक हो कि भाषा के इन उपयोगों से उसका नाता न टूटे। इससे आगे बढ़ें तो हम पाएँगे कि भाषा हमें अपने परिवेश में कई रूपों में बिखरी मिलती है, जैसे- अखबार, साइनबोर्ड, पोस्टर, विज्ञापन आदि। इसके अतिरिक्त भाषा अपने साहित्यिक रूप में भी उपलब्ध होती है। ऐसे में हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि स्कूल के दस-बारह वर्षों के दौरान विद्यार्थियों में हिंदी के व्यापक और विविध स्वरूप की गहरी समझ विकसित हो जाए।

ज्ञान का विस्तार

स्कूली शिक्षा पूरी होने तक विद्यार्थी का भाषा-बोध और साहित्य-बोध इस सीमा तक विकसित हो जाए कि उसमें किसी रचना के बारे में स्वतंत्र राय बनाने का आत्मविश्वास पैदा हो सके। वह पाठ्यपुस्तकों की परिधि के बाहर भी किसी रचना से जुड़कर उस पर भावनात्मक और बौद्धिक प्रतिक्रिया कर सके। वह तरह-तरह के औपचारिक व अनौपचारिक विषयक्षेत्रों में प्रयुक्त होने वाली भाषा के रूपों से परिचित हो और उसका प्रयोग कर सके। वह संदर्भ और आवश्यकता के अनुसार विभिन्न किस्म की शैलियों से परिचित हो सके। विद्यार्थियों को भाषा की ताकत का अहसास हो। वह इस बात को समझंे कि भाषा
के माध्यम से हम केवल संप्रेषण ही नहीं करते, बल्कि जो हम सोचते और महसूस करते हैं उसे संुदर, प्रभावशाली व्यंजनात्मक और पैने ढंग से अभिव्यक्त करने के लिए भाषा एक सशक्त साधन है। विद्यार्थी हिंदी की बारीकी और सुंदरता को परख सके। उसे यह ज्ञान हो कि हिंदी के माध्यम से यथार्थ और काल्पनिक दुनिया की रचना की जा सकती है। भाषा के माध्यम से विद्यार्थी का ज्ञानक्षेत्र इतना विस्तृत हो कि वह राष्ट्रीय समाचारपत्रों और पत्रिकाओं की परिधि में आने वाले व्यक्ति, परिवेश और समाज से जुड़े मुद्दों की सामान्य जानकारी रख सके।

कौशलों का विस्तार

दस-बारह वर्ष तक स्कूल में हिंदी पढ़ने के बाद हिंदी पर विद्यार्थियों की पकड़ इतनी मज़बूत हो जाए कि वे कुशल पाठक, लेखक, श्रोता व विश्लेषक हों। वे अख़बारों के संपादकीय पृष्ठ और पत्रिकाएँ बिना कठिनाई के पढ़ और समझ पाएँ और उन पर टिप्पणी कर पाएँ। वे आवश्यकता और उद्देश्यों के अनुसार किसी किताब, लेख आदि में से उपयुक्त सामग्री इकट्ठा करके उसका सटीक उपयोग कर सकें। वे रेडियो-टेलीविज़न पर हिंदी में प्रसारित होने वाली औपचारिक परिचर्चाओं व भाषणों को सुनकर समझ सकें। विद्यार्थियों में बोलने का कौशल इस सीमा तक विकसित हो चुका हो कि औपचारिक चर्चाओं व वाद-विवाद में बेझिझक होकर बोल सकें। वे अपने विचारों और भावनाओं को स्पष्ट, व्यवस्थित और असरदार ढंग से अभिव्यक्त कर सकें। भाषा पर उनका इतना अधिकार हो चुका हो कि वे जीवन की विविध स्थितियों से आत्मविश्वासपूर्वक गुजर सकें। विभिन्न प्रकार के औपचारिक व अनौपचारिक संदर्भों के अनुसार विद्यार्थियों में उचित शैली चुन सकंे। वे सहज, कल्पनाशील, प्रभावशाली और व्यवस्थित ढंग से कि़स्म-कि़स्म का लेखन कर सकें। भाषा को जानदार बनाने के लिए उर्दू के और आंचलिक शब्दों का इस्तेमाल करने की समझ उनमें हो। पढ़ना, सुनना, लिखना, बोलना-इन चारों प्रक्रियाओं में विद्यार्थी अपने पूर्वज्ञान की सहायता से अर्थ की रचना कर पाएँ और कही गई बात के निहितार्थ को भी पकड़ पाएँ।

  •  कही या लिखी गई बात को आँख मूँदकर स्वीकार करने की बजाय विद्यार्थी उसे आलोचनात्मक दृष्टि से परखें और उस पर प्रासंगिक सवाल उठाएँ।

  •  विद्यार्थियों के तार्किक कौशल इतने विकसित हों कि वे दो बातों के बीच के अंतस्संबंध को समझ सकें तथा अपने द्वारा कही या लिखी गई बात की तर्क से पुष्टि कर सकें।

  •  विद्यार्थियों में अवलोकन और विश्लेषण के कौशलों का भरपूर विकास हो चुका हो। वे चीजों, स्थितियों, लोगों, परिवेश और मनोभावों का बारीक और विश्लेषणात्मक वर्णन कर सकें। इन कौशलों की मदद से विद्यार्थी भाषा की नियमबद्धता को भी पहचान पाएँ। साथ ही साथ परिवेश और समाज के विभिन्न पहलुओं का वैज्ञानिक विश्लेषण कर पाएँ।

  • भाषा, कला और सृजनात्मकता व कल्पनाशीलता का गहरा संबंध है। विद्यार्थियों का दस-बारह वर्षों तक हिंदी के साथ संपर्क उनमें कलाबोध विकसित
    करे और वे आसपास बिखरी कला को उसके विविध रूपों में सराह सकें। उनके काम में कलात्मकता और सृजनशीलता झलके।

 

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